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मेरे कोट की जेब का सामान

भूल गया हूं गुलाब का फूल रखना कोट की जेब में भूल गया हूं आजकल गुलाब का फूल रखना कोट की जेब मेंअब उसमें नज़र का चश्मा पड़ा रहता है… मिलता था उन दिनों एक छोटा सा फोल्डिंग कंघामिलता था उन दिनों एक छोटा सा फोल्डिंग कंघाजो जेब में पड़ा रहता था देखता जब किसी हंसीं चेहरे को“मुझे इस्तेमाल कर लो” मुझसे कहता थाभूल गया हूं उसको रखना आजकलकोट का वह हिस्सा अब खाली पड़ा रहता है…… शौक था कभी जेब में मेवे रखना काशौक था कभी जेब में मेवे रखना काउनके हर दाने के स्वाद को महसूस करने काकोट की उस जेब में अबदवाइयों का पैकेट पड़ा रहता है… मेरे कोट की जेब का सामान बदलता रहता है… घूमते थे शहर की गलियों मेंना दिन का ना रात का होश थामीलों दूर तक चलते चले जाते थेदिल में ही नहीं पैरों में भी जोश था जेब में दोस्तों के कुछ खत पड़े रहते थेकुछ अपना भी टूटे दिल का अंश पड़ा रहता थाबिछड़ गए अब कुछ दोस्तपैरों का भी जोश गयाकोट की जेब में अब रिक्शेवाले का नंबर पड़ा रहता है मेरे कोट की जेब का सामान बदलता रहता है… बूढ़ा हो गया मेरा कोटकुछ कुछ मेरे जैसा लगता हैकुछ जगह से जीर्ण कुछ थका हुआ सा लगता हैमेरी उम्र के साथ उसका नक्शा बदलता रहता है मेरे कोट की जेब का सामान बदलता रहता है…

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आज दिल मेरा उड़ता परवाज़ है…

आज दिल मेरा उड़ता परवाज़ है जो कभी थक कर था बैठा पंख कटे नहीं थे उसके फिर भी उसको यूं ही लगतारह जाऊंगा ज़मीन पर हमेशा मैं आसमान कभी छू नहीं सकता बैठा रहता था अपने पंख सिकोड़ करअपना मुंह छिपाए उनमें आसमां था तकताकमज़ोर हैं पंख मेरे मज़बूत सारा जहां हैचीलों और बाज़ों के बीच मैं अदना सा फाख्ता यही सोचता हमेशा वो आसमान तक नहीं जा सकतामानता था पर हमेशा वो एक बातवक्त से पहले किस्मत से ज़्यादा किसी को नहीं मिलतापर कोशिश मेरा काम है जो मैं नहीं छोड़ सकता बेशक आसमां बहुत दूर है मन मेरा थकान से चूर हैइतना हौसला तो हूं कर सकतागली के मोड़ तक तो हूं जा सकता धीरे-धीरे रास्तों पर चलते हुएपंखों को थोड़ी मज़बूती देते हुए वो कोशिश करना सीख गयाचीलों और बाज़ों को पीछे छोड़ते हुए वो उड़ना सीख गया आज पहुंच गया बहुत ऊपर उसी आसमान को चीरतालगता था उसको जिस तक नहीं पहुंच सकतादिल आज मेरा उड़ता परवाज़ है जो अब कभी थक कर नहीं बैठता।।

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छोटी गौरैया

रोज़ सवेरे एक गौरैया मेरी खिड़की पर आती हैज़ोर ज़ोर से चूं चूं करकेकबूतर की शिकायत लगाती है जब जाती हूं मैं बाहरतसले की तरफ उड़ जाती हैजहां बैठा होता है कबूतरउधर गर्दन घुमाती है जब भगाती हूं कबूतर कोखुशी से चहचहाती हैचुगती है दाने बाजरे केपानी में नहाती है सखियों संग उछल कूद करखूब शोर मचाती हैरोज़ सवेरे छोटी गौरैयामेरी खिड़की पर आती है।।

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वो चमक जो मशालें जला गई

उठी थी वह चमक बड़ी कमज़ोर सी बुलंद हौसलों ने ऐसी ताप दीहिला दी नींव मज़बूत दीवारों कीबुझते बुझते कईं मशालें जला गई दबी थी दिलों में चिंगारियांघरों में शोले टिमटिमा रहे थेतेज़ हवा का झोंका यूं चला गईबुझते शोलों को मशालें बना गई हौसले बुलंद थे गुनाहों केबाज़ुओं में उनकी ज़ोर थातोड़ दिए रोशनी के सूरज सभीबिखरा दिया स्याह अंधेरा चौखट का दिया बनी वो रोशनीअंधेरे को यूं छटा गईएक नहीं कईं सूरज सजा दिएकईं मशालें बुझते बुझते जला गई।।

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नींद की पीड़ा

नींद सोचती होगी कहां कैद हो गई मैं यही कहती होगी तुमसे….थोड़ा मुझे आज़ाद करोथोड़ा तो परवाज़ करो अंधेरे के गर्द में जैसेदबी हूं किसी कर्ज़ मेंथोड़ा मुझे चमकने दोथोड़ी चांदनी लेने दो थोड़ा मुझे आज़ाद करोथोड़ा तो परवाज़ करो गुम गई हूं सोने मेंतुम्हारी आंखों के हर कोने मेंकुछ तो राह समझने दोकभी तो मुझे निकलने दो थोड़ा मुझे आज़ाद करोथोड़ा तो परवाज़ करो मैं भी कभी डर जाती हूंएक ही जगह घबराती हूंऔर भी आंखें देखने दोउनको भी तो परखने दो तुम्हारे पास भी आऊंगीऔर दुनिया तो समझने दोमुझ पर यह एहसान करोथोड़ा मुझे आज़ाद करोथोड़ा तो परवाज़ करो।।

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उसकी आँखें

चेहरे पर चमक तो बहुत है और होठों पर मुस्कुराहट हमेशा रहती हैबोलती है बहुत ही संजीदा सेजैसे कानों में मिश्री घोलती है फिर भी क्यों लगता है कि कुछ छुपा रही हैमन में है कईं गम जिन्हें दबा रही हैउसकी आंखों में एक अलग सी खामोशी हैउसकी आंखें क्यों अंधेरे दिखा रही हैं देखता हूं जब भी उसको मोहब्बत की बातें करते हुएदेखता हूं जब भी उसको मुस्कुराहट बिखरते हुएउसकी आवाज़ और उसकी बातों से ऊपरकहीं ज़्यादा उसकी आंखों में खो जाता हूं आंखों के नीचे गहरे गड्ढों में जैसे सो जाता हूंबहुत गहरी हैं उसकी आंखें क्या कहना चाहती हैंलगता है मानो कईं गम के समंदर छुपाती हैं सारी मुस्कुराहट सारी मोहब्बत की उसकी बातेंउसकी आंखों के आगे बहुत खोखली पड़ जाती हैंलफ़्ज़ों से ज़्यादा उसकी आंखें मुझसे बहुत कुछ कह जाती हैं।।

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वह बाज़ार

वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था जहां अपनों का मेला सा लगता थाजाते थे जब वहां पर हमहर मोड़ अपना सा लगता था दुकानों के गल्ले पर बैठाहर शख्स अपना सा लगता थावह बाज़ार कभी अपना सा लगता था कईं कलाकारों के कारनामे थेकहीं बूटियां छापने के, कहीं सिलने के कारखाने थेवहीं कईं गलियों में रिश्तेदारों के घर हुआ करते थेजिनके घर हम बिना पूछे चले जाया करते थेउन घरों उन गलियों में मजमा सा लगता थावह बाज़ार कभी अपना सा लगता था खुशबू आती थी उस तरफ़जहां चाट का ठेला लगता थाबराबर में दुकान पर बैठा हलवाईकचोरी आलू की सब्ज़ी बनाता थापकौड़े समोसे जहां आम हुआ करते थेवह बाज़ार कभी अपना सा लगता था खनकते सोने के कंगन किसी हाथों के लिएझनकती पायल की आवाज़ नंगे पांवों के लिएमाथे का टीका सूरज को लजाता थारुक जाते थे कई झूलेजब कानों का बुंदा हिंडोला खाता था जो सोने चांदी से सजास्वर्ण महल सा लगता थावह बाज़ार कभी अपना सा लगता था।।

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क्या तुम कान्हा बन जाओगे?

लिए बांसुरी हाथों में सुर मिला के साज़ों मेंक्या मंत्रमुग्ध कर पाओगेहाथ में लिए बांसुरीक्या तुम कान्हा बन जाओगे सजा कर सर पर मोर पंखलिए इंद्रधनुष के सारे रंगक्या सारा जग रंग जाओगेसजाए सर पर मोर पंखक्या तुम कान्हा बन जाओगे पीतांबरी चोला पहने जो चलते ग्वालों संगगोपियों संग करें ठिठोली खेले रास रंगवन है जिनका आंगन पर्वत जिनका दासजितनी मोहक सूरत जिनकी उतना तेज प्रकाश क्या लगता है स्वांग रचतुम ऐसा क्या कर जाओगेसंग बांसुरी मोर पंखक्या तुम कान्हा बन जाओगे? कान्हा कान्हा रटते रहोराधे राधे जपते रहोकुछ और नहीं तो क्या पताएक दिन उनको पा जाओगे यह सोचना बेकार हैकि तुम कान्हा बन जाओगे।।

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कभी तो बोलो कुछ मुझसे

कभी तो बोलो कुछ मुझसे टटोलो कभी तो मन मेरापूछो उसमें राह मुझसेहर कोना कहेगा कुछ मेरा मिलेगा तुमको एक कोनाअरमान छुपाए जहां मैंनेकुछ कभी न कह पाईकुछ सुन न पाए तुम मुझसे कभी तो बोलो कुछ मुझसे एक कोना कुछ नाराज़ सा हैशिकायतों का बाज़ार सा हैपहुंचो वहां तो थाम लेनासब्र को संग ले चलना चाहे बहुत कुछ कहना तुम सेकभी तो बोलो कुछ मुझसे जानती हूं तुम्हें आदत नहींइतना सुनने-सुनाने कीछोड़ दो मन यूं ही मेरापकड़ लो राह कहीं और की कुछ पल चाहती हूं हक सेबेशक न बोलो कुछ मुझसे।।

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स्वीकृति

स्वीकृति परुुष को नारी समाज पर स्वीकृति दौलत को फटेटाट परस्वीकृति ओहदे को जो बठै कुर्सी परस्वीकृति उन बालों को चांदनी सजी जिन परस्वीकृति उस पेड़ को जो देता छाया बौने कोस्वीकृति आसमान को जो करता तर धरती के हर कोने कोस्वीकृति मेहमान को जो आए हमारे घर या देश की धरती परस्वीकृति मेज़बान को जो फेरता महंु या रख देता दि ल खोलकरस्वीकृति कि सी रंग को हैया रूप कोस्वीकृत घटुती छांव को है या ठंडी धपू कोस्वीकृति ज़बरदस्ती हैया है मजबरूी दिल से निकली आवाज़ है या हालात की मज़ं रूीस्वीकृति एक पल की है या सदियों कीस्वीकृति सिर्फ़ एक विचार हैया प्रतिभतिूतिक्या स्वीकार करने का अर्थपर्णू समर्थनर्थ है?या फ़िर ये विचारों और हालातों का मथंन है?थम जाना एक पल अब जो स्वीकारो कि सी बात को, कि सी जन को या हालात को..सोचना क्या स्वीकृति सचमचु स्वीकारना हैया सिर्फ़ एक गर्दन का हिलाना है…..

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