उसकी आँखें

चेहरे पर चमक तो बहुत है

और होठों पर मुस्कुराहट हमेशा रहती है
बोलती है बहुत ही संजीदा से
जैसे कानों में मिश्री घोलती है

फिर भी क्यों लगता है कि कुछ छुपा रही है
मन में है कईं गम जिन्हें दबा रही है
उसकी आंखों में एक अलग सी खामोशी है
उसकी आंखें क्यों अंधेरे दिखा रही हैं

देखता हूं जब भी उसको मोहब्बत की बातें करते हुए
देखता हूं जब भी उसको मुस्कुराहट बिखरते हुए
उसकी आवाज़ और उसकी बातों से ऊपर
कहीं ज़्यादा उसकी आंखों में खो जाता हूं

आंखों के नीचे गहरे गड्ढों में जैसे सो जाता हूं
बहुत गहरी हैं उसकी आंखें क्या कहना चाहती हैं
लगता है मानो कईं गम के समंदर छुपाती हैं

सारी मुस्कुराहट सारी मोहब्बत की उसकी बातें
उसकी आंखों के आगे बहुत खोखली पड़ जाती हैं
लफ़्ज़ों से ज़्यादा उसकी आंखें मुझसे बहुत कुछ कह जाती हैं।।

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