
नींद सोचती होगी कहां कैद हो गई मैं
यही कहती होगी तुमसे….
थोड़ा मुझे आज़ाद करो
थोड़ा तो परवाज़ करो
अंधेरे के गर्द में जैसे
दबी हूं किसी कर्ज़ में
थोड़ा मुझे चमकने दो
थोड़ी चांदनी लेने दो
थोड़ा मुझे आज़ाद करो
थोड़ा तो परवाज़ करो
गुम गई हूं सोने में
तुम्हारी आंखों के हर कोने में
कुछ तो राह समझने दो
कभी तो मुझे निकलने दो
थोड़ा मुझे आज़ाद करो
थोड़ा तो परवाज़ करो
मैं भी कभी डर जाती हूं
एक ही जगह घबराती हूं
और भी आंखें देखने दो
उनको भी तो परखने दो
तुम्हारे पास भी आऊंगी
और दुनिया तो समझने दो
मुझ पर यह एहसान करो
थोड़ा मुझे आज़ाद करो
थोड़ा तो परवाज़ करो।।