वह बाज़ार

वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था

जहां अपनों का मेला सा लगता था
जाते थे जब वहां पर हम
हर मोड़ अपना सा लगता था

दुकानों के गल्ले पर बैठा
हर शख्स अपना सा लगता था
वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था

कईं कलाकारों के कारनामे थे
कहीं बूटियां छापने के, कहीं सिलने के कारखाने थे
वहीं कईं गलियों में रिश्तेदारों के घर हुआ करते थे
जिनके घर हम बिना पूछे चले जाया करते थे
उन घरों उन गलियों में मजमा सा लगता था
वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था

खुशबू आती थी उस तरफ़
जहां चाट का ठेला लगता था
बराबर में दुकान पर बैठा हलवाई
कचोरी आलू की सब्ज़ी बनाता था
पकौड़े समोसे जहां आम हुआ करते थे
वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था

खनकते सोने के कंगन किसी हाथों के लिए
झनकती पायल की आवाज़ नंगे पांवों के लिए
माथे का टीका सूरज को लजाता था
रुक जाते थे कई झूले
जब कानों का बुंदा हिंडोला खाता था

जो सोने चांदी से सजा
स्वर्ण महल सा लगता था
वह बाज़ार कभी अपना सा लगता था।।

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