वो चमक जो मशालें जला गई

उठी थी वह चमक बड़ी कमज़ोर सी

बुलंद हौसलों ने ऐसी ताप दी
हिला दी नींव मज़बूत दीवारों की
बुझते बुझते कईं मशालें जला गई

दबी थी दिलों में चिंगारियां
घरों में शोले टिमटिमा रहे थे
तेज़ हवा का झोंका यूं चला गई
बुझते शोलों को मशालें बना गई

हौसले बुलंद थे गुनाहों के
बाज़ुओं में उनकी ज़ोर था
तोड़ दिए रोशनी के सूरज सभी
बिखरा दिया स्याह अंधेरा

चौखट का दिया बनी वो रोशनी
अंधेरे को यूं छटा गई
एक नहीं कईं सूरज सजा दिए
कईं मशालें बुझते बुझते जला गई।।

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