हम लोग अक्सर अखबारों में या न्यूज़ चैनलों पर युवाओं के किसी न किसी जाल में फंसे जाने के बारे में पढ़ते और सुनते हैं।
इसके लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराना सही है? बाहर वाला, बच्चे या परिवार। आखिर ज़िम्मेदार कौन है?
एक उम्र में बच्चे नासमझी कर सकते हैं, परन्तु किसी की बातों में आकर सोच समझ कर युवाओं का गलत कदम उठाना तभी मुमकिन है अगर उनमें परिवार के लिए आदर और प्यार न हो। यहां ज़िम्मेदारी मां-बाप की भी बनती है के वो बचपन से बच्चों के साथ थोड़ा ही सही पर मूल्यवान समय व्यतीत करें।
मेरा मानना है कि परिवार अगर संस्कारों से जुड़ा रहता है तो किसी बाहर वाले के लिए युवाओं को बहलाना फ़िज़ूल है। परिवार में एकजुटता और संस्कार मज़बूत जड़ का काम करते हैं। कोई भले ही ज़ोर ज़बरदस्ती कर ले, परन्तु चालाकी से पेड़ को अपनी ज़मीन से अलग नहीं कर सकता।
आज अपनी वेबसाइट के माध्यम से मैं अपने मन की बात पाठकों के सामने व्यक्त कर पा रही हूं। मैं पूरी उम्मीद करती हूं कि आप लोग मेरे विचारों से सहमत होंगे।
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